रिश्ते
कुछ सोचते सोचते अचानक रिश्तो पर आकर मन कंही अटक सा गया। अभी कुछ दिनों पहले ही अपने कुछ करीबी लोगो के बिच था। वैसे तो २६ साल पुरानी जान पहचान है पर इन बरसो में कभी ज्तादा घनिष्ठता नही रही। पर उस दिन जो देखा उससे मन काफी व्यथित हो गया और एक इच्छा हुई की अगर कुछ किया जा सके तो जरुर प्रयत्न करना चाहिए। कुछ बताने से पहले उस मित्र और अपने बारे में कुछ बताता चलु - हमारी जान पहचान किसी माध्यम से है - परिवेश एकदम भिन्न - उमर में भी कोई १०/१२ सल् का अन्तर है। मेरी पृष्टभूमि बौधिक और जब परिचय हुआ तब वो शायद कॉलेज में था। पर उस परिवार ने कभी मेरे अस्तित्व को नही स्वीकारा न ही कभी जो मेरे पास था उस का सन्मान किया। उनका दोष भी नही है। उन लोगो का परिवेश भौतिक है और में बुद्धिजीवी जिस वस्तु का वो सन्मान करते है वो मेरे लिए गौण थी और आज भी है। पर जिस माध्यम से परिचय है उस के कारण जीवन भर कुछ न कुछ लेना देना तो लगा ही रहेगा।
इसी क्रम में कोई १२/१३ वर्ष पहले एक फ़ोन आया - उन महाशय के विवाह का निमंत्रण - फ़ोन पर मुझे बताया गया की अन्तर-जातीय विवाह है कोई रिश्तेदार शामिल नही हो रहे अगर आप आना चाहे तो जरुर आए। जिस ने निमंत्रण दिया उन्हें भी कंहा पता था की मैं उस विवाह के कितना पक्ष में हो सकता हूँ। चूँकि उन महासय से पहले से भी कोई बहुत लगाव या बातचीत नही थी सो विवाह मैं शामिल होना एक औपचारिकता मात्र थी। उस दिन भी मुझे लगा था उस ने जो निर्णय लिया है उसमें मैं कितना बड़ा शुभ चिन्तक हो सकता हुँ उसे पता नही था। समय गुजरता रहा और यदा कदा समाचार मिलते रहे ज्यादातर खुशहाली के ही समाचार थे सो मैं भी खुश हो लिया करता था चलो अपना कोई करीबी सुखी जीवन व्यतीत कर रहा है। जिस से विवाह हुआ वह भी किसी ऊंचे सरकारी पद पर आसीन थी सो किसी चिंता की जरुरत भी नही थी। दोनों के परिवारों मैं कंही कोई मेल नही था जैसा की प्रेम-विवाहों मैं अक्सर होता है सो यह कोई चिंता का विषय भी नही था।
पर उस दिन जब मैंने उनके रिश्तो को सिसक सिसक कर चलते देखा तो मन मैं इतनी व्यथा हुई की क्या कहूँ। रहा नही गया तो मैंने उन साहब से बाते की। पहली बार इतनी बात की और शायद उन्हें भी पहली बार महसूस हुआ हो मेरी भवनाओं का।
बातो से जो सामने आया उससे लगा अपने हाथो लोग जीवन नरक सामान क्यों बना लेते है। जब विवाह का निर्णय लिया था तब आज जिन हालातों से गुजर रहे है उनका पूर्वाभास तो था ही। ये तो मालूम ही था की समाज में लीक से अलग हट कर कुछ करेंगे तो कुछ न कुछ कठिनाइयाँ तो आयेगी ही और ज्यादातर अकेले ही जीवन का रास्ता तय करना होगा।
इन्ही बातो ने कुछ विचार मन में पैदा कर दिए। प्रेम विवाह में जब आदमी प्रेम करता है तो शुरु में जब तक प्रेम पुरी तरह परवान चढ़ता है तब तक एक दुसरे के गुण ही गुण देखता है जिन की वजह से प्रेम की शुरुआत होती है और इन्ही के सहारे चल कर दुसरे दौर में पहुँचता है और साथ साथ जीवन बिताने का निर्णय करता है। इस निर्णय में भी दोनों पक्षों में एक बगावत निहित होती है परन्तु दोनों प्रेम में इतने डूबे होते हैं की आगे की कठिनाईयों को जानते हुए भी नज़रंदाज़ कर देते है और साथ जीने मरने की कसमे ले लेते हैं। यंहा तक तो सब कुछ सही ही चलता है पर आज तक वे दोनों अकेले थे, अब कई नए लोग इस सम्बन्ध में जुड़ जाते है। सब का अपना पूर्वाभाश, परिवेश, बौधिक स्तर और मन्यताऐ भी इस में जुड़ जाते है। अब सुरु होता है प्रेम का इम्तेहान। कहने भर को तो दोनों के परिवार पीछे छूट गए थे पर हकीकत में क्या रिश्ते टूट सकते हैं कभी, और इन्ही रिस्तो को छोड़ने और निभाने में एक द्व्दं चलने लग जाता है। ज्यादातर प्रेम विवाह पढ़े लिखे लोगो में ही देखने में आते हैं और उन से अप्पेक्षा रहती है कि वो इसे अच्छी तरह से निभाएं। इसमे वो सक्षम भी हैं पर कंही उनका अहम् उनके सामने आ कर खड़ा हो जाता है। इस अहम् कि भेंट क्या क्या चढ़ जाऐगा उनको इसका भास तक नही हो पाता। ऐसा नही कि वो प्रयत्न नही करते पर शायद अहम् के परदे के कारण साफ़ साफ़ देख नही पाते। धीरे धीरे छोटी छोटी बातें पहाड़ का रूप ले लेती हैं और दूरियां बढ़नी शुरु हो जाती हैं। कंही बच्चे आ गए तो समस्या और विकट हो जाती है।
में इन लोगो से बस इतना ही पूछना चाहता हूँ कि क्या आपके प्रेम में इतना भी बल नही है कि अपना अच्छा बुरा समझ सकें। जिस विस्वास के बल बूते साथ चलने कि कसमे ली थी क्या वो लहरों पर बसे थे। और ज़रा ये तो सोचे कि विफलता का मूल्य क्या होगा। कितने लोगो कि जिन्दगी उजड़ जायेगी। जब चले थे तो सिर्फ़ दो लोगो ने घर समाज से बगावत की और अपनी खुशी के लिए कुछ निर्णय किए। अगर अपने अहम् के इतने अधीन थे तो क्यों जिन्हें पीछे छोड़ दिया था जीवन से जोड़ा।
दोनों तो फिर भी अहम् की तुस्टी के लिए अलग हो सकते है और दुखी होते हुए भी सुखी होने का मुखौटा पहन कर जीवन जीने का ढोंग कर लेंगे, बच्चो और बाकि जो लोग जुड़ गए उनका क्या हाल होगा। क्या वो भी आपके अहम् का मुखौटा पहन सकेंगे। क्या प्रेम इतना कमजोर साबित हुआ कि एक तुच्छ अहम् तक से लड़ नही सका। कंहा साथ जीने मरने के सपने बुन कर इन राहों पर निकल पडे थे जिन पर कांटे नही तो फूल भी तो नही थे।
और हँसी आती है ये देख कर कि समस्या का हल कितना आसान है जरुरत सिर्फ़ संवाद की ही तो है। हाँ इतना जरुर है संवाद उन्ही लोगो के बिच हो जिन्होंने साथ चलने का निर्णय किया था और सभी पूर्वाभाशो से दूर हट कर हो। प्रेम की उस छत्रछाँया में हो जंहा से इस पथ पर चलने की शुरुवात की थी। जिस प्रेम ने ज़माने, समाज से लड़ने का साहस दिया था उसी प्रेम में समस्या को सुलझाने का बल भी है। जरुरत विस्वास और प्रयास की ही है। हमे कोई हक नही है जब चाहा अपने अनुकूल निर्णय ले लिया और स्थितियां प्रतिकूल हो गई तो आसान राह ले कर समस्या से भाग खड़े हो। कितने ही जीवनों को हमारे अहम् की भेंट चढा देँ। कभी ऐसा जरुर हो सकता है कि अपने आप कोई राह न सूझे उस स्थिथि में किसी मित्र कि सहायता ली जा सकती है। हाँ मित्र ऐसा हो जिससे दोनों अपने मन की बात खुल कर कर सके बिना झिझक और डर के। साथ ही मित्र का दोनों के प्रति इमानदार होना भी उतना ही जरुरी है। अंत में हल तो दोनों को ही निकलना है मित्र तो एक सहायक है कुछ राहें दीखाने में जो आज उन लोगो को नही नज़र आ रही। कल शायद वो दोनों इस बात पर हँसे कि इतनी आसान राह भी हमे नज़र नही आई। मेरे अपने अनुभव के आधार पर इतना जरुर कह सकता हूँ एक बार इस तूफान के गुजर जाने के बाद जब भी इस की याद आएगी हँसी आएगी अपने पर। और एक बात प्रेम से बड़ा संसार में कुछ नही है। इसी लिए प्रेम को इश्वर का दूसरा रूप कहा गया है।
इस लेख के माध्यम से अपने मित्र को बताने की एक कोशिश कर रहा हूँ अगर कुछ हल निकल सके उसके जीवन का और दूसरा प्रयास यह है कि शायद किसी और को मेरी बाते अच्छी लगे और इस से मिलते जुलते हालातों में इसे पढ़ कर अपना जीवन बिगड़ने से बचा ले। किसी एक इन्सान के भी ये विचार काम आ सके तो मुझे मेरा प्रयास अत्यन्त सार्थक लगेगा। मेरा पुरा जीवन रिश्तों के इर्द घूमता रहा है और रिश्ते मेरे लिए सर्वोपरि रहे हैं। किसी के काम आ सका तो अपने जीवन को धन्य समझूंगा।